ज़िन्दगी के हर मोड़ पर तुझे मैं देखता गया,
पर तूने मुझे मुड के न देखा कभी ।
स्वासों ही स्वास मे तू मुझे जीती रही,
पर उसका होश तुझे आया नहीं कभी ।
मेने तुझे हसाया भी रुलाया भी,
तूने महसूस किया नहीं मुझे कभी ।
साया बनके तेरे साथ चलता गया,
पर तूने मुझे पहचाना नहीं कभी ।
मैं सोचता गया तुझे समझाऊ कैसे,
कैसे तुझे मैं तेरा अक्स दिखलाऊ ।
तू कही और ही दुनिया में खोई थी,
देख के उसे ही उसमें सोई थी ।
ये सोच के मै आगे चलता गया ,
तू कही और ही दुनिया में खोई थी,
देख के उसे ही उसमें सोई थी ।
ये सोच के मै आगे चलता गया ,
वक़्त बदलता गया तू भी बदलती गयी ।
फिर मैं एक दिन तेरे सामने आ ही गया,
तूने फिर भी मुझे पहचाना नहीं ।
तूने फिर भी मुझे पहचाना नहीं ।
पर जाती तू कहा तू सदा यही थी,
तू रोती हुई और घबरायी हुई आई ।
कहने लगी बहुत हुआ अब तो मिला दो,
मेरा परिचय मुझ ही से करा दो
पर ऐसे कोई मिल पाता नहीं
क्यूँ तू अपने आप को छोड़ती नहीं ।
वो कहने लगी मुझे आता नहीं,
देखती थी मुझको हर जगह हर घड़ी ।
पर पहचान नहीं पायी थी मुझे कभी,
फिर एक दिन उसे अपनी याद आ ही गयी ।
अब उसने मुझे समझा तो हैं,
अपने आप को पहचाना तो हैं ।
अब तो जान ही लेगी मुझको कभी,
क्योंकि मेरा उसका कोई भेद नहीं।
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