अथाह में अथाह बयां नहीं होती,
बंद हो जाते हैं होठ जुबाँ नहीं खुलती।
मोह रिस्तो से सम्भंधों से कहा होता हैं,
मन कि कल्पना ही हृदय में महसूस होती हैं।
महसूस हो जाए वो प्रेम ही कहाँ ,
प्रेम में तो द्वेत ही नहीं होता।
यह जगत तो मन का ही प्रसार हैं ,
मन का मिटना ही प्रलय के असार हैं।
प्रलय कही बाहर नहीं अंदर ही होती हैं ,
अद्वेत में टिकना ही क्या महा प्रलय होती हैं।
बंद हो जाते हैं होठ जुबाँ नहीं खुलती।
मोह रिस्तो से सम्भंधों से कहा होता हैं,
मन कि कल्पना ही हृदय में महसूस होती हैं।
महसूस हो जाए वो प्रेम ही कहाँ ,
प्रेम में तो द्वेत ही नहीं होता।
यह जगत तो मन का ही प्रसार हैं ,
मन का मिटना ही प्रलय के असार हैं।
प्रलय कही बाहर नहीं अंदर ही होती हैं ,
अद्वेत में टिकना ही क्या महा प्रलय होती हैं।
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